मुर्गी
Gallus gallus domesticus
मज़बूत और अलग मिज़ाज वाले आँगन के पक्षी — अंडों, माँस और झुंड के सादे आनंद के लिए पाले जाते हैं।
View मुर्गी breedsScientific classification
The मुर्गी's place in the tree of life, from domain down to species.
- अधिजगतEukaryotaसुकेंद्रिक (यूकैरियोट)
- जगतAnimaliaजंतु
- संघChordataरज्जुकी (कॉर्डेट)
- वर्गAvesपक्षी
- गणGalliformesभूचर पक्षी
- कुलPhasianidaeतीतर और सहयोगी
- वंशGallusजंगली मुर्गी
- जातिGallus gallusलाल जंगली मुर्गी
- उपजातिGallus gallus domesticusमुर्गी
मुर्गी colors, patterns and markings
Every color, pattern and marking the taxonomy records for मुर्गी, by part of the body. Each breed page shows which clubs accept which ones.
पंख
Color of the feathers.
Colors
मुर्गी पालन परिचय
भारत में मुर्गी पालन ग्रामीण जीवन से लेकर शहरी बागवानों तक फैला है। काड़कनाथ से लेकर असील तक, यहाँ की नस्लें सहस्राब्दियों पुरानी हैं।
मुर्गी (Gallus gallus domesticus) Phasianidae परिवार की सर्वाहारी पक्षी है। वैज्ञानिक प्रमाण बताते हैं कि इसका पूर्वज लाल जंगली मुर्ग (Red Junglefowl) दक्षिण एशिया और भारतीय उपमहाद्वीप में ही पालतू बना था।
वज़न: बेंटम नस्ल ०.५-१ किलो, सामान्य नस्ल १.५-५ किलो। उम्र ५-१० साल। ये दिन में ज़मीन कुरेदकर चारा ढूँढती हैं और रात में ऊँची जगह पर बैठकर सोती हैं। झुंड में रहना इनकी फ़ितरत है -- अकेलेपन में तनाव होता है।
भारत की विविध जलवायु -- राजस्थान की तपती गर्मी, केरल की उमस, पंजाब की सर्दी -- में मुर्गी पालन के तरीके भी अलग-अलग होते हैं।
भारत में मुर्गी की नस्लें
दुनिया में करीब ३८ मान्यता प्राप्त नस्लें हैं। भारत में काड़कनाथ, असील, ग्रामप्रिया, वनराजा जैसी देशी और विकसित नस्लें प्रमुख हैं।
भारत में मुर्गियों को तीन मुख्य वर्गों में बाँटा जाता है: अंडा उत्पादन, माँस उत्पादन, और दोहरा उद्देश्य। ICAR-CPDO ने ग्रामीण माहौल के अनुकूल कई नस्लें विकसित की हैं जो व्यावसायिक फ़ीड पर निर्भर हुए बिना अच्छा उत्पादन देती हैं।
काड़कनाथ (Kadaknath) मध्य प्रदेश के झाबुआ और अलीराजपुर ज़िलों की GI-टैगड नस्ल है। काले माँस, ऊँचे प्रोटीन और कम वसा की वजह से इसकी कीमत देसी बाज़ार में काफ़ी अधिक होती है।
ब्रह्मा और कोचिन नस्लें एशियाई मूल की हैं और भारत से इनका ऐतिहासिक नाता रहा है।
| नस्ल | विशेषता | उद्देश्य |
|---|---|---|
| काड़कनाथ | काला माँस, GI टैग, झाबुआ MP | माँस, औषधीय महत्त्व |
| असील | प्राचीन भारतीय नस्ल, मज़बूत शरीर | परंपरागत, शौक |
| ग्रामप्रिया (ICAR) | देसी माहौल उपयुक्त, अच्छा अंडा उत्पादन | अंडा और माँस |
| वनराजा (ICAR) | दोहरा उद्देश्य, रंग-बिरंगी | अंडा और माँस |
| ब्रह्मा | एशियाटिक, बड़ा आकार, शांत स्वभाव | माँस |
| कोचिन | एशियाटिक, पैरों पर पंख, अच्छा माँस | माँस |
मुर्गी पालन का इतिहास
मुर्गी का पूर्वज लाल जंगली मुर्ग दक्षिण एशिया का मूल निवासी है। सिंधु घाटी सभ्यता के समय से इस उपमहाद्वीप में मुर्गी पालन के प्रमाण मिलते हैं।
लाल जंगली मुर्ग (Gallus gallus) आज भी भारत के जंगलों में पाया जाता है। लगभग ८,००० साल पहले दक्षिण और दक्षिणपूर्व एशिया में पालतू मुर्गी का विकास हुआ। सिंधु घाटी सभ्यता की पुरातात्विक खुदाई में मुर्गी की हड्डियाँ मिली हैं, जो बताती हैं कि भारतीय उपमहाद्वीप मुर्गी पालन के आदिम केंद्रों में से एक था।
यहाँ से मुर्गी पश्चिम की ओर मध्य पूर्व, मिस्र और भूमध्यसागरीय इलाकों में फैली। १९वीं-२०वीं सदी में व्यावसायिक नस्लों का विकास हुआ। भारतीय नस्लें -- खास तौर पर काड़कनाथ और असील -- हज़ारों साल पुरानी हैं।
मुर्गी की शारीरिक बनावट
जाति के अनुसार रंग, आकार और बनावट अलग होती है, लेकिन कुछ बुनियादी लक्षण सभी मुर्गियों में समान रहते हैं।
मुर्गी का शरीर पंखों से ढका होता है। सिर पर लाल कलगी (comb) और कान के नीचे लटकन (wattle) होती है। पैरों पर शल्कनुमा त्वचा और ज़मीन कुरेदने वाले नाखून होते हैं। मुर्गा मुर्गी से बड़ा और रंगीन होता है।
| विशेषता | बेंटम नस्ल | सामान्य नस्ल |
|---|---|---|
| ऊँचाई | २०-३० सेमी | ४०-७० सेमी |
| वज़न | ०.५-१ किलो | १.५-५ किलो |
| पंखों का रंग | विविध | विविध |
| कलगी का प्रकार | नस्ल के अनुसार | नस्ल के अनुसार |
मुर्गी का स्वभाव और व्यवहार
मुर्गियाँ झुंड में रहती हैं। झुंड में एक ऊँच-नीच का क्रम होता है। दिन में चारा ढूँढती हैं, रात में ऊँची जगह पर सोती हैं।
मुर्गियाँ सामाजिक पक्षी हैं और झुंड में रहना पसंद करती हैं। हर झुंड में एक pecking order होता है जिसमें शक्तिशाली मुर्गी को पहले खाना मिलता है।
दिन में मुर्गियाँ ज़मीन कुरेदकर कीड़े और दाने ढूँढती हैं और धूल-स्नान (dust bath) करती हैं। यह धूल-स्नान परजीवियों से बचाव का प्राकृतिक तरीका है। शाम को ऊँची जगह पर बैठकर सोती हैं।
नियमित संपर्क में मुर्गियाँ पालतू हो जाती हैं और हाथ से खाना लेती हैं।
रोज़ाना की देखभाल
मुर्गी की देखभाल में रोज़ाना की दिनचर्या ज़रूरी है। भारत की विविध जलवायु में देखभाल के तरीके अलग होते हैं।
रोज़ाना की दिनचर्या:
- सुबह दड़बा खोलें, ताज़ा पानी दें
- तय समय पर दाना दें
- अंडे इकट्ठा करें
- आँखें, नाक, पैर, पंख जाँचें
- शाम को दड़बा बंद करें
भारत की विविध जलवायु के लिए सुझाव:
- राजस्थान / हरियाणा की गर्मी: ४५ डिग्री से ऊपर तापमान में छाया और ठंडा पानी अनिवार्य है। सुबह-शाम को दाना दें, दोपहर नहीं।
- केरल / पश्चिम बंगाल की उमस: दड़बे में हवा का आवागमन बहुत ज़रूरी है। गीला बिछाल (litter) जल्दी बदलें।
- पंजाब / यूपी की सर्दी: रात में दड़बा बंद रखें, चूज़ों को गर्माहट दें।
दड़बा: सूखा, हवादार, ऊँची बाड़, घोंसले के डिब्बे (हर ३-४ मुर्गी के लिए एक), धूल-स्नान की जगह।
मुर्गी का आहार और पोषण
उम्र के अनुसार सही आहार और हमेशा ताज़ा पानी स्वस्थ मुर्गी की बुनियाद है।
उम्र के अनुसार आहार:
- चूज़े (०-६ हफ़्ते): स्टार्टर फ़ीड (प्रोटीन २०-२३%)
- बढ़ती मुर्गी (६-१८ हफ़्ते): ग्रोअर फ़ीड
- अंडा देने वाली: लेयर फ़ीड + कैल्शियम (सीप का चूरा)
- माँस के लिए: ब्रॉयलर फ़िनिशर
देसी पूरक आहार: बाजरा, ज्वार, मक्के का दलिया, हरी पत्तियाँ, सब्ज़ियों के छिलके -- ये व्यावसायिक दाने के साथ मिलाकर दिए जा सकते हैं।
| दें | न दें |
|---|---|
| बाजरा, ज्वार, मक्का | फफूँदी लगा दाना |
| हरी पत्तियाँ, घास | कच्ची बीन्स (ज़हरीली) |
| सीप का चूरा (कैल्शियम) | एवोकाडो |
| उबला अंडा, कीड़े | बहुत नमकीन खाना |
स्वास्थ्य और बीमारियों से बचाव
रानीखेत (Newcastle Disease) का टीका भारत में सबसे ज़रूरी है। ICAR-CPDO की सिफ़ारिश के अनुसार टीकाकरण करें।
| उम्र | टीका | तरीका |
|---|---|---|
| ५-७ दिन | रानीखेत (F strain) | आँख या नाक में बूँद |
| १४-१६ दिन | गम्बोरो (IBD) | पानी में या आँख में |
| २१ दिन | रानीखेत बूस्टर (RD-2) | पानी में |
| ४५-५० दिन | फ़ाउल पॉक्स | पंख में सुई |
| हर ६ महीने | रानीखेत बूस्टर | पानी में |
आम बीमारियाँ:
- जूँ और माइट: पंखों की जड़ में छोटे परजीवी; धूल-स्नान और दवाई से ठीक
- पेट के कीड़े: नियमित कृमिनाशक दें
- साँस की बीमारी: नाक से बहाव, छींक -- पशु चिकित्सक से मिलें
- अंडा फँसना: आपातकाल, तुरंत इलाज ज़रूरी
- बम्बलफ़ुट: पैर के तलवे पर घाव, साफ़ फ़र्श रखें
- मारेक रोग: टीका हैचरी में लगाएँ
तुरंत डॉक्टर के पास जाएँ अगर: खाना-पीना बंद हो, साँस लेने में दिक्कत हो, दस्त हों, या कई मुर्गियाँ एकदम मर जाएँ।
दड़बा और रहने की जगह
अच्छा दड़बा मुर्गी की सेहत की नींव है। भारत की गर्मी, मानसून और सर्दी को ध्यान में रखकर बनाएँ।
आदर्श दड़बे की ज़रूरतें:
- सूखा और हवादार
- ऊँची बाड़ (ज़मीन से ६० सेमी)
- हर ३-४ मुर्गी के लिए एक घोंसले का डिब्बा
- शिकारियों से सुरक्षित जालीदार घेरा
- धूल-स्नान की जगह
गर्मी से बचाव (मई-जून): छाया अनिवार्य है। पानी के बर्तन छाँव में रखें। दड़बे की छत पर छप्पर या सफ़ेद रंग करें तापमान कम करने के लिए। राजस्थान और हरियाणा में गीले बोरे या कूलर का पानी भी इस्तेमाल होता है।
मानसून में: मानसून के दौरान बिछाल (litter) जल्दी-जल्दी बदलें। नमी से रोग फैलते हैं।
शिकारी: कुत्ते, चूहे, साँप, नेवला, और बाज़ मुख्य ख़तरा हैं। रात को दड़बा बंद करें।
प्रजनन और चूज़ों की देखभाल
देसी नस्लें आमतौर पर ६-७ महीने में अंडे देना शुरू करती हैं। चूज़े फूटने में २१ दिन लगते हैं।
अंडे देने की उम्र: GRAMApriya और ग्रामीण नस्लें ५-६ महीने में अंडे देती हैं। काड़कनाथ और असील जैसी देसी नस्लें ६-७ महीने या उससे अधिक ले सकती हैं।
मुर्गा और प्रजनन: अंडे पाने के लिए मुर्गे की ज़रूरत नहीं। चूज़े के लिए मुर्गे का होना ज़रूरी है। एक मुर्गा ८-१२ मुर्गियों के साथ रह सकता है।
| चरण | उम्र | ज़रूरत |
|---|---|---|
| अंडे से निकलना | २१ दिन | तापमान ३७.५ डिग्री, नमी ५५-६५% |
| ब्रूडर दौर | ०-६ हफ़्ते | गर्माहट शुरू में ३५ डिग्री, हर हफ़्ते ३ डिग्री कम |
| स्टार्टर दाना | ०-६ हफ़्ते | स्टार्टर फ़ीड, ताज़ा पानी |
| ग्रोअर दौर | ६-१८ हफ़्ते | ग्रोअर फ़ीड, बाहर जाने की जगह |
मुर्गी लेने से पहले क्या सोचें
मुर्गी पालन ५-१० साल की ज़िम्मेदारी है। खर्च, जगह और स्थानीय नियमों की जाँच पहले करें।
मुर्गी कहाँ से लें:
- ICAR-CPDO हैचरी या सरकारी पोल्ट्री केंद्र
- स्थानीय देसी मुर्गी पालक
- पशु बाज़ार
- विश्वसनीय ऑनलाइन समूह
स्वस्थ मुर्गी के लक्षण: चमकदार आँखें, चुस्त-दुरुस्त, चिकने पंख, नाक-आँख से बहाव नहीं, सामान्य चाल।
नई मुर्गी को कम से कम एक हफ़्ते अलग रखें (quarantine) फिर पुराने झुंड में मिलाएँ।
| खर्च का प्रकार | राशि (रुपए) |
|---|---|
| देसी चूज़ा (प्रति नग) | ५०-१५० |
| काड़कनाथ चूज़ा (प्रति नग) | १००-२५० |
| १० मुर्गियों का दड़बा निर्माण | ३,०००-१५,००० |
| मासिक दाना (प्रति मुर्गी) | २००-४०० |
| सालाना टीका खर्च (प्रति मुर्गी) | ५०-१५० |
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
मुर्गी पालन से जुड़े सबसे आम सवालों के जवाब।
क्या मुर्गी अच्छा पालतू जानवर है?
हाँ, मुर्गियाँ सामाजिक पक्षी हैं। नियमित संपर्क में ये पालतू हो जाती हैं और हाथ से दाना लेती हैं। कम से कम दो रखें क्योंकि अकेलेपन में तनाव होता है।
मुर्गी कितने साल जीती है?
आमतौर पर ५-१० साल। देसी नस्लें ज़्यादा और ब्रॉयलर कम जीती हैं। उम्र के साथ अंडा उत्पादन कम होता जाता है।
मुर्गी पालन में कितना खर्च आता है?
दड़बा बनाने में ३,०००-१५,००० रुपए और हर मुर्गी पर महीने में करीब २००-४०० रुपए दाने का खर्च होता है। अंडे और माँस से काफ़ी खर्च निकल आता है।
क्या मुर्गी पालन मुश्किल है?
नहीं, यह शुरुआती लोगों के लिए भी सीखने में आसान है। रोज़ाना १५-३० मिनट काफ़ी है। ICAR-CPDO की ग्रामप्रिया नस्ल देसी माहौल के लिए बेहतरीन विकल्प है।
क्या परिवार या बच्चों के लिए मुर्गी ठीक है?
हाँ, बच्चे मुर्गियों की देखभाल से ज़िम्मेदारी सीखते हैं। मुर्गे से सावधानी रखें। मुर्गी छूने के बाद साबुन से हाथ धोना ज़रूरी है।
क्या अंडे के लिए मुर्गे की ज़रूरत है?
नहीं। मुर्गी बिना मुर्गे के भी अंडे देती है, लेकिन वे अंडे उर्वर नहीं होते और उनसे चूज़े नहीं निकलते।
क्या शहर में मुर्गी पालने की कानूनी अनुमति चाहिए?
हाँ, कई शहरी नगर पालिकाओं में घर में मुर्गी पालने के लिए अनुमति लेनी पड़ती है। अपने स्थानीय नगर पालिका या नगर निगम से पहले जानकारी लें।